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होली

प्रिय तुम भी फागुन लाते , प्रेम के रंग में रंग मुझे जाते । बरसों किए इंतजार पिया, मन तुम भी मेरा सावन के जाते ।                                                         एक ही रंग हम तुम रंग  जाते ,                        इश्क अगर तुम हमसे कर पाते ।                    गले लगा लो ,प्रेम से प्रियतम                                     मेरे होकर मुझे होली कर जाते ।        Purnima Acharya M.A. hindi ,sanskrit B.ed. Ctet,Ntt
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उपवन के माली

परिवार में अनुशासन होना चाहिए ,शासन नही  । जहाँ शासन परिवार के बीच है वहां महाभारत है । जहां शासन परिवार से बाहर के लिए है ,वहां चक्रवर्ती सम्राट है । जहां परिवार के लिए है वहां कुरुक्षेत्र है । परिवार के प्रत्येक व्यक्ति की अपनी अपनी मर्यादा है,प्रत्येक रिश्तों की अपनी अपनी मर्यादा है । जब कोई अपनी मर्यादा को लांघ कर दूसरे की मर्यादा में घुसने की कोशिश करता है ,किसी रिश्ते की मर्यादा में घुसता है । वही महाभारत है ,वही क्लेश है ।एक भी कड़ी अगर टूट रही है तो समझ लीजिए कि आपमें परिवार चलाने का हुनर नही है ।  रहने वाले तो  एक ही  घर मे ,एक ही छत के नीचे एक ही रसोई में एक साथ कितनी पीढिया रह लेते है,सब खुश रहते है,शिकायते इनके घरों में नही होती  ।नमन ऐसे परिवारो को । मजे की बात है कि इस घर मे किसी की निंदा नही मिलती है । क्या इस घर मे सब के सब अच्छे लोग आते है  कितने कितने घरों की बेटियां,कितने कितने संस्कार ,सब एक जैसी तो बेशक नही होती ,कोई सीधा है कोई तेज है ,कोई कुछ है,कोई कुछ है ।ऐसे घर को चलाते है उस घर के बड़े, बुजुर्ग ।   1- सब अपनी अपनी मर्यादा का पा...

शंकर बनो

ईश्वर की आराधना उनसे मांगने के लिए नही की जाती,वरण करने के लिए की जाती है,उस देवत्व को पाने के लिए की जाती है । सब शंकर के भक्त है ,शंकर बनना कोई नही चाहता । शंकर के गले मे विषधर है (धोखे का ,फरेब का,नीचा दिखाने का),।गले मे कालकूट विष जब्त है(अपमान का) जिसे नीचे नही उतरने दिया हृदय से नही लगाया ।कानों में बिच्छू है(ताने,उलाहने,व्यंगों का डंक) । फिर भी माथे पर (दिमाग मे)असीम शांति और शीतलता का चंद्रमा है । सर पर गंगा है (पवित्रता है)। हृदय पवित्र है,निष्पाप है ,निष्कलंक है । आपको किसी ने दुःख दिया है ,चोट पहुँचाया है ।नही भूल पा रहे है ।माफ नही कर पा रहे है ।आपने अपने सर पर जहर का बोझ रखा है । बोझ उतारिए ,माफ करिए ..समझिए वो मानसिक रूप से बहुत बीमार है,उनपर तरस खाईए ।उनपर आपसे कही ज्यादा जहर का बोझ है ।वो माफ नही कर पा रहे,जहर बांट रहे है कि शांति मिले ।अब ऐसे बीमार इंसान से आप चोटिल हो गए तो उनके संस्कार के भागीदार हो गए ,उनके कर्म के साझीदार हो गए ।  ©Purnima Mishra

समझौता

मेरी समझौते की जिंदगी में थोड़े पल का हठ किया, इस बार नही ,इस बार नही,कहकर खुद से छल किया था । जो एक बार समझौता करता है,उसे हर बार करनी पड़ती है, मालूम था मुझे फिर भी ,बदलने का मैंने एक भ्रम किया था । समझौता नियति है मेरी तो मेरी नियति ही सही । आखिरी समझौता अब मैंने अपने आप से किया है । जीवन से लड़ना नही है अब मुझको, जो साथ है मेरे उसपर ही अब अभिमान किया है ।  मैं बेहतर थी,बेहतर हूँ, बेहतर रहूंगी ,  किसी और के प्रमाणपत्र पर जीवन का फलसफा नही रखूंगी ।  मेरे शहर में खुशियां है,किसी और कि मोहब्बत की बेरुखी से  अपना शहर नही उजाड़ करूँगी ।  मुझे रब ने जो बख्सा है वही नियामत काफी है ।  मैं 'पूर्ण' हूँ खुद से ही बेइंतहा प्यार करूँगी,जियूंगी हरपल,मौत को भी शर्मसार करूँगी ।  कोई शिकायत नही किसी से अब ,आखिरी मुलाकात समझ कर सबको माफ करूँगी ।  जैसे खुद को माफ करके फिर मुस्कुराती हूँ,  गैरों के दिल दुखाने पर उनको भी ऐसे ही माफ करूँगी । ©purnima mishra

क्या सिर्फ मायका दोषी

कुछ लोगो को शायद अपनी कहानी लगे ।plz पोस्ट का मतलब न तो किसी को भड़काना है ,न किसी को चोट पहुँचाना । बस इतना ही समझिएगा की अधिकतर लोग अपने व्यवहार पर ध्यान नही देते ।सिर्फ मायके को दोषी बना देते है ।5% करते होंगे ऐसा पर 95% मायका अपनी बेटी को खुश देखना चाहता है,वो उसका घर नही बिगाड़ते ,अब सुरक्षा न दे मरने के लिए नही छोड़ सकते ।ससुराल वाले बहुत से ऐसे है जिनके पास बहुत ऑप्शन होता है ,वो बहु को मार भी देते है । तो महराज सिर्फ मायके को न दोष दे ,बेटे का घर -गृहस्थी उजाड़ने में बेटे की माँ का भी बहुत बड़ा रोल होता है ।40% सास बहू को गृहस्थी सिखाने में सच मे परेशान होती है ,उन्हें हो सकता है बुरा समझ लिया जाए पर वो बहु- बेटे के बीच नही आती ।छोटी छोटी बात पर बेटे का कान भरती ।खुद को प्रताड़ित मां का रोल नही अदा करती । पर 60% सास बेटे को खोने के डर से,बहु के पल्ले से बंधने के डर से,अपने कुर्सी के डर से  बहुत हद तक नीचे गिर जाती है । कुछ  बहुत ही आदर्श बेटे,परिवार परिवार करने वाले खुद के सास -ससुर को गाली भी दे लेंगे मारने पीटने की बात भी कर लेते है ।खुद के परिवार में कोई बिना गाली दिए बात...

उठो

बस बहुत हुआ शिकायतों का ये अम्बार निकाल फेको मन के अब सारे गुबार जो हारे है वो वक़्त को दोषी कहते है  जीतने वाले जीत की बोली रखते है  योद्धा कभी परिस्थिति से कब घबराया  अपने बल पर समय को भी अपना दास बनाया । ©purnima

मैं नारी हूँ

नारी हूँ समर्पण की प्रतिमूर्ति तुम मुझे कमजोर समझ न लेना हस्ती ऊँची है , हृदय से पृथ्वी हूँ प्रेम का सागर हूँ क्रोध में ज्वालामुखी इतना आसान नही है नारी देखो कमजोर समझने की भूल ना करना । रचनाकार-पूर्णिमा मिश्रा