मुझे तो पसंद था संयुक्त परिवार मुझे गांव पसंद था, सबकी मन की करके सबको खुशी देने की अभिलाषा थी । मैं गलत नही थी बुरी नही थी , शादी के तुरंत बाद से यूं इतना नीचे गिराना क्या सही था ,माना नही आता था मुझे बहुत कुछ... प्यार के दो बोल से समझाना भी मुश्किल था । आक्षेप ,तानों से भरी वाणी क्या मेरा मन छलनी नही हुआ करता था क्या । मेरी हर बातों के पीछे का मतलब गलत ही निकाला जाता था ,सही था क्या । क्या कसूर था मेरा जो कहा था मुझसे मेरे घर मे मेरे हिसाब से रहना पड़ेगा वरना चली जाओ यहां से,हाथ पकड़ कर घर से बाहर कर दूंगा तुम्हे । ये तुम्हारे नफरत की शुरुआत थी,पहली बार दिल टूटा था । तुमने कहा था मेरा परिवार तुमसे खुश नही है छोड़ दूंगा तुम्हे ,तब दिल टूटा था । हल्दी ही तो भूले थे उसके पीछे ऐसे अशांति सही थी कि मेरे बोलने पर तुमने मुझपर पहली बार हाथ उठाया ,मेरा पूरा अस्तित्व टूट गया । तुम्हारा मुझे छोड़ देना क्या मुझे समझ नही आता क्या ।साथ होकर भी तुम साथ नही होते क्या महसूस नही होता मुझको । दूसरे कितना कुछ मुझे कहते रहे वो तुम्हारा पर...