मुझे तो पसंद था संयुक्त परिवार
मुझे गांव पसंद था,
सबकी मन की करके सबको खुशी देने की अभिलाषा थी ।
मैं गलत नही थी बुरी नही थी ,
शादी के तुरंत बाद से यूं इतना नीचे गिराना क्या सही था ,माना नही आता था मुझे बहुत कुछ...
प्यार के दो बोल से समझाना भी मुश्किल था ।
आक्षेप ,तानों से भरी वाणी क्या मेरा मन छलनी नही हुआ करता था क्या ।
मेरी हर बातों के पीछे का मतलब गलत ही निकाला जाता था ,सही था क्या ।
क्या कसूर था मेरा जो कहा था मुझसे मेरे घर मे मेरे हिसाब से रहना पड़ेगा वरना चली जाओ यहां से,हाथ पकड़ कर घर से बाहर कर दूंगा तुम्हे ।
ये तुम्हारे नफरत की शुरुआत थी,पहली बार दिल टूटा था ।
तुमने कहा था मेरा परिवार तुमसे खुश नही है छोड़ दूंगा तुम्हे ,तब दिल टूटा था ।
हल्दी ही तो भूले थे उसके पीछे ऐसे अशांति सही थी कि मेरे बोलने पर तुमने मुझपर पहली बार हाथ उठाया ,मेरा पूरा अस्तित्व टूट गया ।
तुम्हारा मुझे छोड़ देना क्या मुझे समझ नही आता क्या ।साथ होकर भी तुम साथ नही होते क्या महसूस नही होता मुझको ।
दूसरे कितना कुछ मुझे कहते रहे वो तुम्हारा परिवार है ,मैं गैर थी मैंने जैसे ही कहा कुछ तुमने दूसरी बार हाथ उठाया ।तुम हमेशा से चाहते थे ,तुमको छोड़कर चली जाऊं ।मैं नही गयी ...मैं भी इंसान हूँ थक गई सब जुल्म सहते सहते.....
तुमने तीसरी बार हाथ उठाया फिर आदत बना ली ।
जिस चीज के लिए तुम मुझे गलत ठहराते हो न तुमने उसी के लिए किसी और को सही ठहराया है ।
तुम मेरे साथ इतने पक्षपाती क्यों हो ।
इतने अन्यायी क्यों हो ।
Comments
Post a Comment