मेरी समझौते की जिंदगी में थोड़े पल का हठ किया,
इस बार नही ,इस बार नही,कहकर खुद से छल किया था ।
जो एक बार समझौता करता है,उसे हर बार करनी पड़ती है,
मालूम था मुझे फिर भी ,बदलने का मैंने एक भ्रम किया था ।
समझौता नियति है मेरी तो मेरी नियति ही सही ।
आखिरी समझौता अब मैंने अपने आप से किया है ।
जीवन से लड़ना नही है अब मुझको,
जो साथ है मेरे उसपर ही अब अभिमान किया है ।
मैं बेहतर थी,बेहतर हूँ, बेहतर रहूंगी ,
किसी और के प्रमाणपत्र पर जीवन का फलसफा नही रखूंगी ।
मेरे शहर में खुशियां है,किसी और कि मोहब्बत की बेरुखी से
अपना शहर नही उजाड़ करूँगी ।
मुझे रब ने जो बख्सा है वही नियामत काफी है ।
मैं 'पूर्ण' हूँ खुद से ही बेइंतहा प्यार करूँगी,जियूंगी हरपल,मौत को भी शर्मसार करूँगी ।
कोई शिकायत नही किसी से अब ,आखिरी मुलाकात समझ कर सबको माफ करूँगी ।
जैसे खुद को माफ करके फिर मुस्कुराती हूँ,
गैरों के दिल दुखाने पर उनको भी ऐसे ही माफ करूँगी । ©purnima mishra
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