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Showing posts from August, 2019
मोगरे की खुशबू .... ओपिडी में आज भीड़ कुछ जियादा ही थी अपनी बारी के इन्तजार में विजिटर बेंच पर बैठे बैठे मैंने सोचा और टाइम पास के लिए मोबाइल खोल कर मैसेज देखने लगा "क्या में यहाँ बैठ सकती हूँ" "जी" मैंने उसे बिना देखे ही जरा सा सरक कर कहा मोबाइल से नजर तब भटकी जब भीनी सी मोगरे की ख़ुशबू के झोंके ने ध्यान अपनी तरफ खींचा ...मोटे तल्ले वाली चप्पल ...करीने से तराशे हुए पैर के नाखूनों पर चम्पई सा नेलपेंट पतली सी पाजेब ...मेचिंग बिछुओं के साथ, फिरोजी रंग के सूट पर छींट का दुपट्टा ...अमलताश की फलियों सी उँगलियों के पोर... और भरी भरी कंपकपाती हथेलियाँ, हथेलियों में पकड़ा हुआ डा. मीनाक्षी अग्रवाल का परचा... तिरछी निगाह से बस इतना ही देख पाया था तब.. लगा ....कहीं तो देखा हैं... पर कहाँ.. मन में कई चित्र चित्र से तैर गए सीने का दर्द कुछ हल्का होता महसूस हुआ, मेरा नंबर पुकारा जा रहा था इसलिए मैं उठा और सीधा डाक्टर के केबिन में घुस गया सामान्य चेकअप के बाद पांच दिन की दवा और फिर दिखाने की एहतियात लिए बाहर निकला वापसी पर निगाह बेंच की तरफ डाली पर शायद उसका भी नंबर आ चुका था प...
कुछ रिश्ते कभी मरते नही हैं रह जाते हैं यादों में बरसती पलकों की एक दो बूंदों में चैन की नींदों भरी रातों के बिसरे हुए ख्वाबो में। कुछ रिश्ते कभी मरते नही गाहे बगाहे कभी जब कभी कोई गीत बज उठता कहीं दर्द सा उठ खड़ा होता वो किसी कहानी का कोई किरदार अनायास ही किसी चेहरे सा आंखों में तिरता रह जाता है कुछ रिश्ते कभी मरते नही। कोई लफ्ज़ किसी पन्ने पर  किसी अखबार की कहानी में किसी छुवन का अहसास दिलाता कोई चेहरा राह चलते कहीं यूँ ही किसी भूले हुए की याद दिलाता कुछ रिश्ते कभी मरा नही करते वो धड़कनों के साथ चला करते हैं।

स्त्री

वो  स्त्री , जो सचमुच तुमसे प्यार करती है तुमको  # छोड़कर जाने का फैसला एक  # पल  में नहीं करती। महीनों वो खुद को समझाती है और जिस दिन वो तुम्हारे बिना खुद को सम्हालना और समझाना सीख जाती है , ठीक उसी पल वो तुमको छोड़कर सिर्फ़ ख़ुद की हो जाती है। तुमको उस दिन से डरना चाहिए जिस दिन स्त्री प्रेम और स्वाभिमान में से , # स्वाभिमान  को चुनती है। क्योंकि उसी दिन स्त्री तुमसे मिले प्रेम को  # हीरे  की तरह दिल में रख लेती है औऱ सारी दुनिया के लिए दिल के दरवाज़े सदा के लिए बंद कर लेती है। ये उसका अंतिम फैसला होता है तुमको छोड़ कर जाने का। स्त्री सहज  # विद्रोही  नहीं होती, विद्रोह करने से पहले वो बार-बार तुमको  # एहसास  कराती है कि " अब पहले जैसा प्रेम महसूस नहीं हो रहा है , प्रेम को कुछ वक्त दिया करो " तुम उसे और उसकी बातों को लापरवाही से टाल देते हो , और एक दिन वो तमाम यादें और प्रेम समेट कर तुमसे  # दूर  चली जाती है। एक बार प्रेम तज कर और प्रेम समेट कर जा चुकी स्त्री कभी पहली सी नहीं रह जाती। तुम्हारे जिस प्रेम ने उसे  # कोम...