मोगरे की खुशबू .... ओपिडी में आज भीड़ कुछ जियादा ही थी अपनी बारी के इन्तजार में विजिटर बेंच पर बैठे बैठे मैंने सोचा और टाइम पास के लिए मोबाइल खोल कर मैसेज देखने लगा "क्या में यहाँ बैठ सकती हूँ" "जी" मैंने उसे बिना देखे ही जरा सा सरक कर कहा मोबाइल से नजर तब भटकी जब भीनी सी मोगरे की ख़ुशबू के झोंके ने ध्यान अपनी तरफ खींचा ...मोटे तल्ले वाली चप्पल ...करीने से तराशे हुए पैर के नाखूनों पर चम्पई सा नेलपेंट पतली सी पाजेब ...मेचिंग बिछुओं के साथ, फिरोजी रंग के सूट पर छींट का दुपट्टा ...अमलताश की फलियों सी उँगलियों के पोर... और भरी भरी कंपकपाती हथेलियाँ, हथेलियों में पकड़ा हुआ डा. मीनाक्षी अग्रवाल का परचा... तिरछी निगाह से बस इतना ही देख पाया था तब.. लगा ....कहीं तो देखा हैं... पर कहाँ.. मन में कई चित्र चित्र से तैर गए सीने का दर्द कुछ हल्का होता महसूस हुआ, मेरा नंबर पुकारा जा रहा था इसलिए मैं उठा और सीधा डाक्टर के केबिन में घुस गया सामान्य चेकअप के बाद पांच दिन की दवा और फिर दिखाने की एहतियात लिए बाहर निकला वापसी पर निगाह बेंच की तरफ डाली पर शायद उसका भी नंबर आ चुका था प...