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स्त्री

वो स्त्री , जो सचमुच तुमसे प्यार करती है तुमको #छोड़करजाने का फैसला एक #पल में नहीं करती। महीनों वो खुद को समझाती है और जिस दिन वो तुम्हारे बिना खुद को सम्हालना और समझाना सीख जाती है , ठीक उसी पल वो तुमको छोड़कर सिर्फ़ ख़ुद की हो जाती है। तुमको उस दिन से डरना चाहिए जिस दिन स्त्री प्रेम और स्वाभिमान में से ,#स्वाभिमान को चुनती है। क्योंकि उसी दिन स्त्री तुमसे मिले प्रेम को #हीरे की तरह दिल में रख लेती है औऱ सारी दुनिया के लिए दिल के दरवाज़े सदा के लिए बंद कर लेती है। ये उसका अंतिम फैसला होता है तुमको छोड़ कर जाने का।
स्त्री सहज #विद्रोही नहीं होती, विद्रोह करने से पहले वो बार-बार तुमको #एहसास कराती है कि " अब पहले जैसा प्रेम महसूस नहीं हो रहा है , प्रेम को कुछ वक्त दिया करो " तुम उसे और उसकी बातों को लापरवाही से टाल देते हो , और एक दिन वो तमाम यादें और प्रेम समेट कर तुमसे #दूर चली जाती है।
एक बार प्रेम तज कर और प्रेम समेट कर जा चुकी स्त्री कभी पहली सी नहीं रह जाती। तुम्हारे जिस प्रेम ने उसे #कोमलऔर संतुलित बनाया था , तुम्हारा वही प्रेम उसे #जीवन भर के लिए कठोर और #निष्ठुर बना देता है।
तुम लापरवाही में कभी जान ही नहीं पाते कि #मरते दम तक वो स्त्री दुबारा वैसी कभी नहीं बन पाती, जैसी वो तुमसे मिलने से पहले थी।
अपनी #मौज में चलते तुम कभी जान ही नहीं पाते कि -
"तुम एक हरी-भरी , खिली औऱ #खिलखिलाती स्त्री की हत्या कर चुके हो

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शंकर बनो

ईश्वर की आराधना उनसे मांगने के लिए नही की जाती,वरण करने के लिए की जाती है,उस देवत्व को पाने के लिए की जाती है । सब शंकर के भक्त है ,शंकर बनना कोई नही चाहता । शंकर के गले मे विषधर है (धोखे का ,फरेब का,नीचा दिखाने का),।गले मे कालकूट विष जब्त है(अपमान का) जिसे नीचे नही उतरने दिया हृदय से नही लगाया ।कानों में बिच्छू है(ताने,उलाहने,व्यंगों का डंक) । फिर भी माथे पर (दिमाग मे)असीम शांति और शीतलता का चंद्रमा है । सर पर गंगा है (पवित्रता है)। हृदय पवित्र है,निष्पाप है ,निष्कलंक है । आपको किसी ने दुःख दिया है ,चोट पहुँचाया है ।नही भूल पा रहे है ।माफ नही कर पा रहे है ।आपने अपने सर पर जहर का बोझ रखा है । बोझ उतारिए ,माफ करिए ..समझिए वो मानसिक रूप से बहुत बीमार है,उनपर तरस खाईए ।उनपर आपसे कही ज्यादा जहर का बोझ है ।वो माफ नही कर पा रहे,जहर बांट रहे है कि शांति मिले ।अब ऐसे बीमार इंसान से आप चोटिल हो गए तो उनके संस्कार के भागीदार हो गए ,उनके कर्म के साझीदार हो गए ।  ©Purnima Mishra

मैं नारी हूँ

नारी हूँ समर्पण की प्रतिमूर्ति तुम मुझे कमजोर समझ न लेना हस्ती ऊँची है , हृदय से पृथ्वी हूँ प्रेम का सागर हूँ क्रोध में ज्वालामुखी इतना आसान नही है नारी देखो कमजोर समझने की भूल ना करना । रचनाकार-पूर्णिमा मिश्रा

समझौता

मेरी समझौते की जिंदगी में थोड़े पल का हठ किया, इस बार नही ,इस बार नही,कहकर खुद से छल किया था । जो एक बार समझौता करता है,उसे हर बार करनी पड़ती है, मालूम था मुझे फिर भी ,बदलने का मैंने एक भ्रम किया था । समझौता नियति है मेरी तो मेरी नियति ही सही । आखिरी समझौता अब मैंने अपने आप से किया है । जीवन से लड़ना नही है अब मुझको, जो साथ है मेरे उसपर ही अब अभिमान किया है ।  मैं बेहतर थी,बेहतर हूँ, बेहतर रहूंगी ,  किसी और के प्रमाणपत्र पर जीवन का फलसफा नही रखूंगी ।  मेरे शहर में खुशियां है,किसी और कि मोहब्बत की बेरुखी से  अपना शहर नही उजाड़ करूँगी ।  मुझे रब ने जो बख्सा है वही नियामत काफी है ।  मैं 'पूर्ण' हूँ खुद से ही बेइंतहा प्यार करूँगी,जियूंगी हरपल,मौत को भी शर्मसार करूँगी ।  कोई शिकायत नही किसी से अब ,आखिरी मुलाकात समझ कर सबको माफ करूँगी ।  जैसे खुद को माफ करके फिर मुस्कुराती हूँ,  गैरों के दिल दुखाने पर उनको भी ऐसे ही माफ करूँगी । ©purnima mishra