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बेटियों की विदाई

लम्हा लम्हा यूँ ही कुछ छूट रहा है,सब कुछ जो कल तक अपना था बस कुछ पलों में पराए से हो जाएंगे लगता है ।वो सारी चीजें जिनको किसी को हाथ लगाने भर से चिल्ला दिया जाता था,सहज ही किसी और को दे दिए जाते है ।
संजोए गए थे जो बड़े ही जतन से कभी उपयोग करने के लिए अब सब बेकार से हो गए है ।
अपनी दुनिया बदल जाती है पल पल में ...बेटियों की जिंदगी का लम्हा,उनके नजदीक की हर चीज सब धीरे -धीरे छूट रहा होता है ।
वे लोग जिनसे लड़े बिना दिन पूरा नही होता था,उनके लिए भी अब संकोच पनप रहे होते है । गुस्से को शोर मचा मचा के पूरे घर भर से जाहिर कर देने की आदत पल भर में बदतमीजी लगने लगती है खुद को...
कल तक बेपरवाही से जिये गए लम्हे बस यही कही गुम होते जाते है,
परवाह होती है अब किसी को कुछ बुरा नही लगने का ,
न जाने कितनी बार एक-दूसरे का मजाक बनाते बनाते बेमतब दिलों पर चोट कर के हसाँ जाता था,आज मान अपमान के तराजू में तौले जाने लगे ....
दुसरो का दिल और अपना दिल दोनो को बचाने की जद्दोजहद में गम्भीरता का लिबास ओढ़ लिया जाता है ।
छोटी छोटी चीजे जो कल तक यूँ ही जाने दी जाती है,अब ध्यान दिए जाने लगती है ।
बेटियों की जिंदगी बस पल भर में बदलने लगती है ।
घर ही नही बदलता लड़कियों का बहुत कुछ बदल जाता है । सरनेम,जिंदगी ,देखने सुनने का नजरिया,तौर तरीका…....सब कुछ बदल जाता है ।
होती है न बेटियों की दुनिया कुछ ऐसी ही...
जब एक बेटी विदा होती है,पूरी तरह अनजान लोगो मे किसी अजनबी के सहारे...जिनको अपना बनाने की लाखों कोशिशों के बीच भी कभी अपना बन जाने की संतुष्टि नही रहती ।
नई जिंदगी के सपनो के बीच डर और उहापोह को साथ लिए ...विदा हो जाती है बेटियां ..
अपनी चुनरी की गांठ में मायके की सीख लिए हुए,सहनशीलता के ज्ञान से लबालब भरी हुई ।सेवा,त्याग ,समर्पण,प्रेम ,क्षमा का मूल मंत्र जपते हुए ।
मायके जैसा हक कहाँ मिलता होगा फिर..
अल्हड़ता ..बेपरवाही..उन्मुक्त हँसी
क्या लौट के आते होंगे फिर कभी ।
बेटियां विदा होते समय अपना बचपन वही घर की दहलीज पर छोड़ जाती है ...
पड़ोसियों तक भी सुनाई देने वाली बेपरवाह आवाज मद्धम निकलना सीख लेती है ।
शर्माना,सकुचाना,दुसरो का ख्याल रखना सीख लेती है ।
आसान नही होता है यूँ खुद को बदलना ,पूरा व्यक्तित्व बदल कर कुछ और होना तकलीफदेह ही होता है..
बेटियां कह नही पाती ...
कह नही पाती कितना डर है उनके मन में..
कि जिस अजनबी के साथ जा रही है उसपर सहज ही भरोसा करना मुश्किल है उसके लिए ।
वो अनजाने चेहरे,
वो लोग जिनको खुश रखने की सीख लेके विदा हो रही है...
उनके लिए मन मे डर होता है ।
नही कह पाती कि उन अनजाने चेहरो के बीच उसका रहना कितना असहज है ,
और वो अजनबी उसके साथ पूरी जिंदगी कैसे कटेगी ।
उस अजनबी में अपने छोड़ के आये रिश्तो को तलाश करती आंखे ...क्या पाएंगी उस अजनबी में सारे रिश्ते...
मायके वाला सम्मान क्या दे पाएगा वो..
उसके आत्मसम्मान की रक्षा कर पाएगा। वो...
न जाने कितने सवालो के साथ विदा हो जाती है लड़कियां ...
20-25 साल जिस संस्कारों से सिंचित,
जिस माहौल में पली बढ़ी है
अचानक से एक दूसरे घर में
अपने घर से अलग माहौल,
संस्कारों में
शामिल होना ये बदलाव
अचानक ही स्वीकार करना मुश्किल भरा होता है ।
नही कह पाती की दर्द होता है
उनका इस तरह घर छोड़ कर जाना अजनबियों के बीच ...सहम जाता है दिल उसी तरह जैसे एक छोटा बच्चा किसी अपरिचित की गोद मे जाने पर सहम जाता है....-©purnima mishra

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