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वैदिक विवाह अन्य सभी विवाह रीतियों से श्रेष्ठ क्यों??

मैं अपने को विशेषज्ञ तो नहीं मानती लेकिन थोड़ी जिज्ञासु प्रवृत्ति की हूँ ।कोई दिमाग में बात आ जाए तो जब तक पूरा विश्लेषण न कर लूं ,मुझे चैन नही आता ।कुछ दिन पूर्व
पिताजी ने प्रश्न किया वैदिक विवाह श्रेष्ठ क्यों है ??संस्कृत की विद्यार्थी हो न तुम ???
प्रमाण सहित उत्तर दो ।
वो कुछ किरातर्जुनीयम् के रचनाकार कवि भारवि के पिताजी जैसे है ।
पिताजी की आदत रही है मुझे सवालों में उलझाने की ।हालांकि वो चाहते है हम श्रेष्ठ ही नही सर्वश्रेष्ठ हो । ज्ञान के मामले तो हम लोग पीछे न रहे उनकी इच्छा रहती है ।उनकी इच्छा पूर्ण करने और सवालो के जवाब ढूंढने के लिए विवाह से संबंधित रिसर्च कर रही थी ।कि विवाह एक अनुबंध है कैसे???वैदिक विवाह को सभी विवाह रीतियों से श्रेष्ठ क्यों माना जाता है ???तो हर तरह के विवाह पर रिसर्च कर रही हूं । मैने पाया कि आज का समाज भले ही इन विधियो को ढकोसला मानते हो ,पर वैदिक विवाह में जिस बराबरी का ,समता का अधिकार दिया गया है ।वो अधिकार समता का किसी अन्य रीतियों में नही ।
चारों वेदों में ऋग्वेद सबसे प्राचीन है । ऋग्वेद के दसवें मंडल का 85 वां सूक्त और अथर्ववेद के 14 वें कांड का पहला सूक्त विवाह सूक्त हैं ।
आपके समक्ष भी
उदाहरण प्रस्तुत है -
पहले पद में वर कन्या से कहता है ---ऊं इष एकपदी भव सा मामनुव्रता भव विष्णुस्त्वानयतु पुत्रान् विन्दावहै बहूंस्ते संतु जरदष्टय: ।। 1।।
वर कहता है --- हे देवि ! तुम संपत्ति तथा ऐश्वर्य और दैनिक खाद्य और पेय वस्तुओं की प्राप्ति के लिए पहला पग बढ़ाओ , सदा मेरे अनूकूल गति करने वाली रहो । भगवान विष्णु तुम्हें इस व्रत में दृढ़ करें और तुम्हें श्रेष्ठ संतान से युक्त करें जो बुढापे में हमारा सहारा बनें ।
2.ऊं ऊर्जे द्विपदी भव सा मामनुव्रता भव विष्णुस्त्वानयतु पुत्रान् विन्दावहै बहूंस्ते संतु जरदष्टय: ।। 2 ।।
- हे देवी ! तुम त्रिविध बल तथा पराक्रम की प्राप्ति के लिए दूसरा पग बढ़ाओ । सदा मेरे अनूकूल गति करने वाली रहो । भगवान विष्णु तुम्हें इस व्रत में दृढ़ करें और तुम्हें श्रेष्ठ संतान से युक्त करें जो बुढापे में हमारा सहारा बनें...
----ऊं रायस्पोषाय त्रिपदी भव सा मामनुव्रता भव विष्णुस्त्वानयतु पुत्रान् विन्दावहै बहूंस्ते संतु जरदष्टय: ।। 3 ।।
-----------हे देवि ! धन संपत्ति की वृद्धि के लिए तुम तीसरा पग बढ़ाओ ,सदा मेरे अनूकूल गति करने वाली रहो । भगवान विष्णु तुम्हें इस व्रत में दृढ़ करें और तुम्हें श्रेष्ठ संतान से युक्त करें जो बुढापे में हमारा सहारा बनें ।।
---- ऊं मयोभवाय चतुष्पदी भव सा मामनुव्रता भव विष्णुस्त्वानयतु पुत्रान् विन्दावहै बहूंस्ते संतु जरदष्टय: ।। 4।।
....हे देवि ! तुम आरोग्य शरीर और सुखलाभवर्धक धन संपत्ति के भोग की शक्ति के लिए चौथा पग आगे बढ़ाओ और सदा मेरे अनुकूल गति करने वाली रहो भगवान विष्णु तुम्हें इस व्रत में दृढ़ करें और तुम्हें श्रेष्ठ संतान से युक्त करें जो बुढापे में हमारा सहारा बनें ।।
--- ऊं पशुभ्यो: पंचपदी भव सा मामनुव्रता भव विष्णुस्त्वानयतु पुत्रान् विन्दावहै बहूंस्ते संतु जरदष्टय: ।। 5 ।।
--- हे देवि !तुम घर में पाले जाने वाले पांच पशुओं ,( गाय , भैंस , बकरी , हाथी और घोड़ा ) के पालन और रक्षा के लिए पांचवा पग आगे बढ़ाओ और सदा मेरे अनुकूल गति करने वाली रहो भगवान विष्णु तुम्हें इस व्रत में दृढ़ करें और तुम्हें श्रेष्ठ संतान से युक्त करें जो बुढापे में हमारा सहारा बनें ।। ।
---- ऊं ऋतुभ्य षट्पदी भव सा मामुनव्रता भव विष्णुस्त्वानयतु पुत्रान् विन्दावहै बहूंस्ते संतु जरदष्टय: ।। 6 ।।
---- हे देवि ! तुम 6 ऋतुओं के अनुसार यज्ञ आदि और विभिन्न पर्व मनाने के लिए और ऋतुओं के अनुकूल खान पान के लिए छठा पग आगे बढ़ाओ और सदा मेरे अनुकूल गति करने वाली रहो भगवान विष्णु तुम्हें इस व्रत में दृढ़ करें और तुम्हें श्रेष्ठ संतान से युक्त करें जो बुढापे में हमारा सहारा बनें ।। ।
--- ऊं सखे सप्तपदी भव सा मामनुव्रता भव विष्णुस्त्वानयतु पुत्रान् विन्दावहै बहूंस्ते संतु जरदष्टय: ।। 7 ।। ---
----- हे देवि ! जीवन का सच्चा साथी बनने के लिए तुम सातवां पग आगे बढ़ाओ और सदा मेरे अनुकूल गति करने वाली रहो भगवान विष्णु तुम्हें इस व्रत में दृढ़ करें और तुम्हें श्रेष्ठ संतान से युक्त करें जो बुढापे में हमारा सहारा बनें ।।
अब विश्लेषण देखिए-सप्तपदी के मंत्र का उद्देश्य लिखा है -
। ) अन्न वृद्धि के लिए पहली साक्षी- ॐ एको विष्णुजर्गत्सवर्ं, व्याप्तं येन चराचरम्। हृदये यस्ततो यस्य, तस्य साक्षी प्रदीयताम्॥ पहला चरण- ॐ इष एकपदी भव सा मामनुव्रता भव। विष्णुस्त्वानयतु पुत्रान् विन्दावहै, बहूँस्ते सन्तु जरदष्टयः॥१॥
(२) बल वृद्धि के लिए दूसरी साक्षी- ॐ जीवात्मा परमात्मा च, पृथ्वी आकाशमेव च। सूयर्चन्द्रद्वयोमर्ध्ये, तस्य साक्षी प्रदीयताम्॥२॥ दूसरी चरण- ॐ ऊजेर् द्विपदी भव सा मामनुव्रता भव। विष्णुस्त्वानयतु पुत्रान् विन्दावहै, बहूँस्ते सन्तु जरदष्टयः॥२॥
(३) धन वृद्धि के लिए तीसरी साक्षी- ॐ त्रिगुणाश्च त्रिदेवाश्च, त्रिशक्तिः सत्परायणाः। लोकत्रये त्रिसन्ध्यायाः, तस्य साक्षी प्रदीयताम् । तीसरा चरण- ॐ रायस्पोषाय त्रिपदी भव सा मामनुव्रता भव। विष्णुस्त्वानयतु पुत्रान् विन्दावहै, बहूँस्ते सन्तु जरदष्टयः॥३॥
(४) सुख वृद्धि के लिए चौथी साक्षी- ॐ चतुमर्ुखस्ततो ब्रह्मा, चत्वारो वेदसंभवाः। चतुयुर्गाः प्रवतर्न्ते, तेषां साक्षी प्रदीयताम्। चौथा चरण- ॐ मायो भवाय चतुष्पदी भव सा मामनुव्रता भव। विष्णुस्त्वानयतु पुत्रान् विन्दावहै, बहूँस्ते सन्तु जरदष्टयः॥४॥
(५) प्रजा पालन के लिए पाँचवी साक्षी- ॐ पंचमे पंचभूतानां, पंचप्राणैः परायणाः। तत्र दशर्नपुण्यानां, साक्षिणः प्राणपंचधाः॥ पाँचवाँ चरण- ॐ प्रजाभ्यां पंचपदी भव सा मामनुव्रता भव। विष्णुस्त्वानयतु पुत्रान् विन्दावहै, बहूँस्ते सन्तु जरदष्टयः॥५॥
(६) ऋतु व्यवहार के लिए छठवीं साक्षी- ॐ षष्ठे तु षड्ऋतूणां च, षण्मुखः स्वामिकातिर्कः। षड्रसा यत्र जायन्ते, कातिर्केयाश्च साक्षिणः॥
छठवाँ चरण- ॐ ऋतुभ्यः षट्ष्पदी भव सा मामनुव्रता भव। विष्णुस्त्वानयतु पुत्रान् विन्दावहै, बहूँस्ते सन्तु जरदष्टयः॥६॥
(७) मित्रता वृद्धि के लिए सातवीं साक्षी- ॐ सप्तमे सागराश्चैव, सप्तद्वीपाः सपवर्ताः। येषां सप्तषिर्पतनीनां, तेषामादशर्साक्षिणः॥ सातवाँ चरण- ॐ सखे सप्तपदी भव सा मामनुव्रता भव। विष्णुस्त्वानयतु पुत्रान् विन्दावहै, बहूँस्ते सन्तु जरदष्टयः॥७॥ -
यानी मित्रता most important है ।
सप्तपदी पूरी होने के बाद कन्या को वर के वाम अंग में आने का निमंत्रण दिया जाता है ,लेकिन वामांगी बनने से पहले कन्या भी वर से कुछ वचन लेती है ----
--- तीर्थ , व्रत, उद्यापन . यज्ञ , दान यदि मेरे साथ करोगो तो मैं तुम्हारे वाम अंग आऊंगी ।
---- यदि देवों का हव्य, पितृजनों को कव्य मुझे संग लेकर करोगे तो मैं तुम्हारे वाम अंग में आऊंगी ।
--- परिजन , पशुधन का पालन रक्षण भार यदि स्वीकार करो तो मैं वाम अंग में आने
को तैयार हूँ ।
---- आय -व्यय , धन- धान्य में मुझ से यदि विचार करोगे । तो मैं वाम अंग में आने को तैयार हूँ
--- मंदिर , बाग -तड़ाग या कूप का निर्माण पूछ के करोगे ,जब पूजोगे तो साथ लोगे यदि स्वीकार है तो मुझे वामांगी जानना
--- देश- विदेश में तुम क्रय विक्रय की जानकारी मुझे भी देते रहोगे तो मैं तुम्हारे वाम अंग में आऊंगी ।
---- सुनो सातवीं शर्त , पर नारी का संग ,नहीं करोगे तो आऊंगी, वाम अंग स्वामी।
अब देखिए-
कन्या के इन सात वचनों के उत्तर में वर कहता है-
---तुम अपने चित्त को मेरे चित्त के अनूकूल कर लो , (पुनः मित्रभाव)
मेरे कहे अनुसार चलना और मेरे धन को भोगना पतिव्रता बन कर रहना तो मैं भी तुम्हारे सारे वचन निभाऊंगा तुम गृह स्वामिनी बन कर सारे सुख भोगना ।
वर एक बार फिर कन्या से पांच वचन लेता है ----
मेरी आज्ञा के बिना , सोमपान नही करोगी ।उद्यान नही जाओगी
।
पितृघर या कहीं और , मुझसे पूछकर नही जाओगी
जाओगी तो प्रथम आज्ञा लोगी ।
पतिव्रता बन कर रही
तो तब ही तुम्हे मानूंगा कल्याणी । सारे वचन निभाउंगा ।
सामानता का ऐसा अधिकार । किसी एक ने स्वयं को श्रेष्ठ घोषित कर के किसी दूसरे पर अपने फैसले नही थोपे ।बल्कि साथ साथ चलने का अनुरोध किया । एक दूसरे ने ही अपने भावी जीवन के लिए एक साथ मिलकर एक दूसरे के समक्ष शर्त रखी ।
आज का आधुनिक समाज आज लड़की लड़के को पहले मिला देते है,वो एक दूसरे के प्रति अपेक्षा और उम्मीद साझा करते है ,जब एक दूसरे को अनुकूल समझते है तो विवाह के लिए सहमति देते है ।
यानी आधुनिक समाज मे भी फैसले नही थोपे जाते उसी प्रकार वैदिक विवाह संस्कार में विवाह बंधन को थोपा नही जाता ।अपितु अधिकार दिया जाता है ।
अब विवाह पूर्ण हो जाता है तो ध्रुव तारा और अरुन्धती तारा दिखाते है ,मैने इसे सिर्फ दक्षिण की फिल्मों में देखा था ।
पर अपने यहाँ होता है या नही मालूम
फिलहाल ध्रुव तारा दिखाने का उद्देश्य भी मित्रता की भावना ही है -वर कहता है कि तुम स्थिर हो जाओ ,और हमारे हृदय को एक दूसरे के अनुकूक कर लो ।
अरुंधति तारा देख कर कन्या जीवनोपर्यंत देखभाल के वचन देती है ।
-©purnima mishra
साभार- बाबा महाकाल(पीीताजी)
Shri ram sharma's Vaidik vivah paddhati...
Grihyasukta .

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